रविवार, 28 जुलाई 2013

बिना शीर्षक के ...

आज के समाचार देखि के कुछ सोचत रही ...तब कुछ पंक्ति लिखा गइल ...लेकिन बहुत कोसिस के बाद भी शीर्षक समझ में ना आइल .. हो सके  त रौवा सभे एकरा के परिभाषित करी...

एगो बहिन जे बांधली राखी 
भाई के उमिर बढ़ावे के 
अउर रछा के मंगली बचन 
बहिनन के लाज बचावे के 

भाई भी दिहलन इ बचन 
बहिना तोहरा न आंच आई
ओकर जान लहब या जान देहब 
जेकर तोहरा पे आँख आई 

एक दिन एगो लइका भेटा गइल
बहिना के आँख देखावे में 
सब जतन भाई लागी गइलन 
लइका के मजा चखावे में 

दुसरे दिन ओही लइका  के बहिन 
भेटा गइली अन्हारे में 
सब दया धरम भाई भुला गइल 
दू पल के शौख सवारे में 

कोई कुछु कहे जबान से 
लोग गिरल जात बा इमान से 
मानवता शर्म में पानी भइल
एह दू मुहा इन्सान से ...


:प्रवीण 

कोई टिप्पणी नहीं: